1997- दिल्ली उपहार सिनेमा, 59 मौतें। 2011- कोलकाता अस्पताल, 90 मरे। 2019- सूरत कोचिंग सेंटर, 22 स्टूडेंट्स की मौत। 2024 में राजकोट गेमिंग जोन में 27 लोग मारे गए। 2025 में गोवा नाइट क्लब फायर, 25 की मौत। इनमें से एक हादसे के बाद भी अगर गंभीरता से एक्शन होता तो कितने लोगों को असमय काल के गाल में जाने से बचाया जा सकता था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और बीती 3 जून को दिल्ली के मालवीय नगर में अवैध रूप से बने होटल की आग में 21 जानें चली गईं, जिनमें एक पूरा परिवार ही खत्म हो गया। इतने बड़े हादसे से भी सबक सीख लिया होता तो लखनऊ के अलीगंज में 15 युवाओं का यूं भयावह अंत न होता। इन सब हादसों में वही सब कारण सामने आए जैसे बिना फायर एनओसी चलना, लेआउट प्लान का उल्लंघन कर अतिक्रमण और इमरजेंसी एग्जिट तक ब्लॉक कर देना। नियमों की ऐसी धज्जियां तब उड़ रही हैं, जब देश की सुप्रीम कोर्ट कई बार सख्त आदेश दे चुकी है।
मालवीय नगर अग्निकांड के बाद दिल्ली, यूपी की सरकारों ने ऐसे तमाम होटलों और कमर्शल एक्टिविटी पर रोक लगाने के आदेश दिए, जो नियमों का उल्लंघन कर चलती मिलें। चंद रोज का दिखावा हुआ, फिर सब शांत और अब लखनऊ की घटना के बाद सीएम एक बार फिर सारे अवैध कारोबारों को सील करने का वही आदेश दोहरा रहे हैं, जो बीस दिन पहले दिया था। कायदे से तो जब आपने चंद रोज पहले ही फरमान जारी किया है तो उसे दोबारा देने की नौबत ही नहीं आनी चाहिए थी, बल्कि आपको यह पूछना चाहिए था कि उस दिन के आदेश पर अब तक क्या एक्शन हुआ? अलीगंज में आवासीय परिसर की मंजूरी थी, वहां तीन मंजिला होटल चलती रही, जिम्मेदार आंखों पर पट्टी बांधे बैठे रहे।
अब जब इतनी जानें चली गईं, तब इमारत के मालिक को गिरफ्तार कर और चार अफसरों को सस्पेंड कर खानापूर्ति कर ली। ऐसे ही, मालवीय नगर में होटल मालिक को गिरफ्तार कर काम खत्म समझ लिया, पर उन अधिकारियों का क्या, जिन पर फायर एनओसी चेक करने की जिम्मेदारी थी। 6 कमरों के लिए पास हुआ यह ब्रेड एंड ब्रेकफास्ट होटल 25 कमरों तक कैसे पहुंच गया? किसकी अनुमति से यह हुआ, उनकी सजा निलंबन या तबादला ही क्यों, लापरवाही के जिम्मेदारों पर मर्डर का मुकदमा क्यों न चले?
होटल मालिक का यह बयान सिस्टम के गाल पर जोरदार तमाचा है कि नियमों की परवाह इसलिए नहीं की क्योंकि एक करीबी ने उसे बताया था, दिल्ली में सब चलता है। देश की राजधानी में यह बेखौफी आ जाए तो समझ लें सिस्टम में कितनी जंग लग चुकी है।
स्रोत: नवयुग का 15 जुलाई 2026 अंक, पृष्ठ 3। यह मूल मुद्रित लेख का डिजिटल पाठ है। मूल ई-पेपर पढ़ें