विचार

खाली होते गांव, कराहते शहर और बिखरता भारत

डॉ. दीपक गोस्वामीनवयुग — 31 अगस्त 2026 · 4 मिनट पढ़ें
खाली होते गांव, कराहते शहर और बिखरता भारत
मूल मुद्रित अंक में प्रकाशित चित्र।
छपे अंक में पृष्ठ 7 · वर्ष 60 अंक 6

भारत की आत्मा गांवों में बसती है—यह वाक्य हम वर्षों से सुनते आ रहे हैं। लेकिन आज का यथार्थ यह है कि गांवों की आत्मा धीरे-धीरे खाली होती जा रही है और शहर अपनी क्षमता से कहीं अधिक बोझ तले दबते जा रहे हैं। यदि यह प्रवृत्ति नहीं रुकी, तो केवल गांव ही नहीं उजड़ेंगे, बल्कि भारत का सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय संतुलन भी बिखर जाएगा।

एक कटु प्रश्न हमारे सामने खड़ा है—क्या हम सचमुच गांवों का विकास चाहते हैं, या केवल गांवों के संसाधनों का उपयोग? हमें गांव का दूध चाहिए, पर ग्वाले का जीवन नहीं। हमें खेत का अन्न चाहिए, पर किसान का संघर्ष नहीं चाहिए। हमें गांव की ताजी सब्जियां चाहिए, पर उन्हें उगाने वाले हाथों का सम्मान नहीं। हमें मिट्टी की सौंधी खुशबू चाहिए, पर उसी मिट्टी में श्रम करना स्वीकार नहीं। हमें गांव के मेले, त्योहार और लोक संस्कृति आकर्षित करते हैं, पर गांव की जिम्मेदारियां नहीं। हमने गांव को मानो एक ऐसे भंडारघर में बदल दिया है, जहां से आवश्यकता पड़ने पर संसाधन निकाल लिए जाते हैं और फिर उसे उसके हाल पर छोड़ दिया जाता है।

यहीं से वह कड़वा प्रश्न जन्म लेता है—गांव लूट लो, पर गांव में मत रहो—क्या यही आधुनिक भारत का विकास मॉडल है?

आज ग्रामीण पलायन केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और नीतिगत विफलता का परिणाम है। जब एक शिक्षित युवा गांव लौटता है, तो उससे कहा जाता है कि खेती कर ले। लेकिन वह देखता है कि खेती अब केवल परिश्रम का नहीं, बल्कि अनिश्चितता का दूसरा नाम बन चुकी है। बीज, उर्वरक, डीजल, बिजली और सिंचाई की लागत लगातार बढ़ती जा रही है। मौसम का असंतुलन फसल को प्रभावित करता है और बाजार तक पहुंचने पर उचित मूल्य का संकट सामने खड़ा रहता है। ऐसी परिस्थितियों में युवा खेती को सम्मानजनक करियर नहीं, बल्कि मजबूरी मानने लगता है।

दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, डिजिटल कनेक्टिविटी और आधुनिक रोजगार के अवसर अभी भी अनेक स्थानों पर सीमित हैं। जब शहर बेहतर विद्यालय, अस्पताल, इंटरनेट, परिवहन और रोजगार उपलब्ध कराते हैं, तो युवा का पलायन केवल उसकी महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि परिस्थितियों की स्वाभाविक प्रतिक्रिया बन जाता है।

सबसे बड़ी समस्या हमारी सामाजिक मानसिकता है। यदि कोई युवा महानगर में छोटी-सी नौकरी करता है तो उसे सफल माना जाता है, जबकि वही युवा यदि आधुनिक तकनीक के साथ खेती करे तो उसे पिछड़ा समझ लिया जाता है। हमने अपने ही अन्नदाता के श्रम का सम्मान कम कर दिया है। जब तक कृषि और ग्रामीण उद्यमिता को सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी, तब तक गांवों से प्रतिभा का प्रवाह शहरों की ओर जारी रहेगा।

इस प्रवृत्ति के दुष्परिणाम अब स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं। अनेक गांवों में घर खाली हो रहे हैं, बुजुर्ग अकेले रह गए हैं, खेती ठेके पर जा रही है और स्थानीय अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ रही है। दूसरी ओर शहरों पर जनसंख्या का अत्यधिक दबाव बढ़ रहा है। आवास महंगे हो रहे हैं, यातायात जाम बढ़ रहा है, प्रदूषण गंभीर होता जा रहा है और जीवन की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। विडंबना यह है कि वही लोग सप्ताहांत में ग्रामीण जीवन का अनुभव करने के लिए फार्महाउस और रिसॉर्ट खोजते हैं।

स्रोत: नवयुग का 31 अगस्त 2026 अंक, पृष्ठ 7। यह मूल मुद्रित लेख का डिजिटल पाठ है। मूल ई-पेपर पढ़ें

डॉ. दीपक गोस्वामी