चाहे कोई भी दल सत्ता में हो, जब तक उसका शासन और प्रशासन आम जनता के प्रति जवाबदेह न हो तब तक वो कितना भी ढोल पीटता रहे, जनता उसके दावों पर विश्वास नहीं करती। आम जनता को बड़े स्तर के बड़े घोटालों से इतना सरोकार नहीं होता जितना उनकी रोज की जिंदगी में पुलिस और प्रशासन के भ्रष्टाचार से होता है। इस स्तर का भ्रष्टाचार, हुक्मरानों का अहंकार और आम मतदाता की उपेक्षा का खामियाजा सीधा मुख्यमंत्री या प्रधान मंत्री को भुगतना पड़ता है।
आज मीडिया दो खेमों में बंटा हुआ है। एक तरफ हैं, निजी टीवी चैनल और दूसरी तरफ है सोशल मीडिया। निजी टीवी चैनलों के मालिकों को सरकार विज्ञापन के नाम पर बहुत मोटी रकम देती है। इसलिए इन चैनलों के उन एंकरों को भी बहुत मोटी रकम मिलती है जो रात-दिन सरकार का एकतरफा गुणगान करते हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। पिछली सरकारों में जब निजी चैनल और सोशल मीडिया दोनों ही नदारद थे तब भी ये बंटवारा इस तरह था कि सरकारी नियंत्रण वाला दूरदर्शन और सरकार से विज्ञापनों के नाम पर मोटा पैसा लेने वाले अखबार, तत्कालीन सरकार का भौंपू हुआ करते थे।
जबकि दूसरे अखबार विपक्षी दलों से समर्थन लेकर सरकार की आलोचना करते थे। हालांकि उस दौर में ये फर्क इतना प्रखर नहीं था कि आम आदमी उसकी गहराई समझ सके। पर आज जो देश में जो हो रहा है उसमें दोनों ही पक्ष एकतरफा अभियान चलाते हैं। जिससे हकीकत पता नहीं चल पाती | उदाहरण के तौर पर, सोशल मीडिया में आए दिन वीडियो आते हैं कि भाजपा सरकारों के बनाए पुल ताश के पत्तों की तरह ढहते रहते हैं और भाजपा सरकारों के बनाए राजमार्गों पर जगह-जगह भारी गड्ढे हो गए हैं।
ऐसा ही एक वीडियो समाचार आया कि नवनिर्मित दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे बनते ही जगह-जगह टूट गया है। पिछले हफ्ते जब मैं इस राजमार्ग पर पहली बार गया तो लगातार कार की खिड़की से बाहर देख रहा था कि वो गड्ढे कहां हैं ? पर मुझे ऐसा कोई गड्ढा नजर नहीं आया। बल्कि ये राजमार्ग इतना बढ़िया बना है कि हम मात्र डेढ़ घंटे में दिल्ली से मुजफ्फरनगर पहुंच गए।
सरकारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार होना कोई नई बात नहीं है। मुंशी प्रेमचंद की कहानी “नमक का दारोगा” 150 साल पहले भारत में चल रहे भ्रष्टाचार का एक नमूना मात्र है। 2500 साल पहले राजनीति के महारथी चाणक्य पंडित ने कहा था, 'शहद के गोदाम की रखवाली करने वाले के होठों पर शहद लगा मिलेगा।' आजादी के बाद से केंद्र और राज्यों की सभी सरकारों ने देश के संसाधनों को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी । क्या वजह है कि नेता किसी भी दल का क्यों न हो, अगर वो पार्षद से लेकर मंत्री तक कभी भी किसी भी पद पर रहा होगा तो उसकी आर्थिक हैसियत उस दौर में कई गुना बढ़ी होगी।
ये कोई छिपी बात नहीं है। अपवाद तो हमेशा और हर जगह होते हैं। पर आम धारणा तो यही है कि राजनीति कोयले की दलाली की तरह एक ऐसा पेशा है जिसमें हाथ काले होते ही हैं। इसलिए मौजूदा दौर में संघ और भाजपा पर जो तीव्र हमला हो रहा है वो क्या उन राजनेताओं द्वारा किया जा रहा है जिनका अपना दामन पाक साफ है? अगर नहीं तो फिर गुलाम अली की गजल की वो लाइन दोहराना अनुचित न होगा, हंगामा है क्यों बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है।
प्रधान मंत्री मोदी ने स्वच्छ भारत अभियान' से लेकर, 'मेक इन इंडिया ', डिजिटल इंडिया ', 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ ', “प्रधान मंत्री मुद्रा योजना', “प्रधान मंत्री उज्ज्वला योजना ', ' प्रधान मंत्री आवास योजना', 'आयुष्मान भारत', “जल जीवन मिशन', “स्किल इंडिया मिशन', “नमामि गंगे', 'सांसद आदर्श ग्राम योजना', “स्टार्टअप इंडिया', “प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना', “प्रधान मंत्री मुद्रा योजना ', 'अटल पेंशन योजना ', प्रधान मंत्री सुरक्षा बीमा योजना', “आत्मनिर्भर भारत अभियान', “उजाला योजना', “अमृत भारत स्टेशन योजना', “वन नेशन वन राशन कार्ड' जैसी तमाम योजनाएं और अभियान चलाए।
विपक्ष कहता है कि ये सब फ्लॉप हो गए, कहीं कुछ नहीं हुआ। जबकि इसका दूसरा पक्ष भी सामने आता है। हमारे घर और दफ्तर के स्टाफ में जो कर्मचारी हैं वे मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश से हैं। उनका कहना है कि उन्हें घर बनाने के लिए सरकार से खासा अनुदान मिला, आजादी के बाद उनके गांव में पहली बार सड़क आई और पेयजल का संकट भी दूर हुआ। ये वो साधारण लोग हैं जिन्हें अकारण झूठ बोलने की कोई आवश्यकता नहीं। उन्हें लाभ मिला है इसलिए वे उसे बताने में संकोच नहीं करते। इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि हर अभियान पूरी तरह से असफल हुआ है। कहीं सफलता और कहीं विफलता का होना असामान्य बात नहीं है।
मुझे लगता है कि चाहे कोई भी दल सत्ता में हो जब तक उसका शासन और प्रशासन आम जनता के प्रति जवाबदेह न हो तब तक वो कितना भी ढोल पीटता रहे, जनता उसके दावों पर विश्वास नहीं करती। आम जनता को बड़े स्तर के बड़े घोटालों से इतना सरोकार नहीं होता जितना उनकी रोजमर्रा की जिंदगी में पुलिस और प्रशासन के भ्रष्टाचार से होता है। इस स्तर का भ्रष्टाचार, हुक्मरानों का अहंकार और आम मतदाता की उपेक्षा का सीधा खामियाजा मुख्यमंत्री या प्रधान मंत्री को भुगतना पड़ता है।
जरूरत इस बात की है कि कोई ऐसी व्यवस्था बने जिसके अंतर्गत आम जनता की छोटी सी छोटी शिकायत पर तुरंत कार्रवाई हो और उसे राहत मिले। इस दिशा में तमिलनाडु के वर्तमान मुख्यमंत्री सी. जोसफ विजय ने जो पहल की हैं उसका बहुत अच्छा संदेश आम जनता के बीच गया है। आगे चल कर वो कितने सफल होंगे ये तो समय ही बताएगा। पर तमिलनाडु तो एक राज्य है, आवश्यकता हर राज्य में ऐसे ही सुधार की है। डबल इंजन का दावा करने वाली प्रांतीय सरकारों में यह काम केंद्र सरकार की पहल पर अविलंब शुरू होना चाहिए। साथ ही महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियां यदि भ्रष्टाचार में बदनाम हुए अफसरों और राजनेताओं की होती है तो उससे सरकार की छवि बहुत खराब होती है। भ्रष्टाचार मुक्त शासन देने के उसके दावे खोखले साबित होते हैं।
एक बात और; इस देश में ईमानदार अफसरों और प्रतिष्ठित सामाजिक लोगों की संख्या इतनी कम नहीं है कि वे शासन और प्रशासन को जवाबदेह बनने के लिए मजबूर न कर सकें। आज के एआई युग में किसी भी व्यक्ति के जीवन के विषय में पता लगाना कठिन कार्य नहीं है। आधुनिक तकनीकी का इस्तेमाल करके देश के हर जिले में ऐसे लोगों की सूची बनाई जानी चाहिए और उन्हें कुछ अधिकार देकर स्थानीय शासन और प्रशासन पर निगरानी रखने के काम सौंपना चाहिए। अगर ऐसा हो सका तो ये जनता और सरकार के बीच की खाई को पाटने का एक महत्वपूर्ण कदम होगा।
स्रोत: नवयुग का 31 जुलाई 2026 अंक, पृष्ठ 1,2। यह मूल मुद्रित लेख का डिजिटल पाठ है। मूल ई-पेपर पढ़ें