विचार

स्वाधीनता के लिए निर्णायक आंदोलन का उद्घोष

नवयुगनवयुग — 15 अगस्त 2026 · 6 मिनट पढ़ें
छपे अंक में पृष्ठ 6 · वर्ष 60 अंक 5

भारत के स्वाधीनता आंदोलन में नौ अगस्त वह ऐतिहासिक तिथि है, जब स्वतंत्रता के लिए निर्णायक संघर्ष का उद्घोष हुआ था। इसलिए इसे अगस्त क्रांति कहा जाता है। नौ अगस्त की तिथि दो महत्वपूर्ण स्मृतियों से जुड़ी है। पहली तिथि नौ अगस्त 1925 है इस दिन क्रांतिकारी आंदोलन को गति देने के लिए काकोरी रेलवे स्टेशन पर सरकारी खजाना लूटा गया था। और दूसरी तिथि नौ अगस्त 1942 है। इस दिन अहिंसक आंदोलन को निर्णायक स्वरूप देने के लिए अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन आरंभ हुआ था। इस आंदोलन का आह्वान महात्मा गांधी ने किया था, पर एक रात पहले आठ अगस्त को ही गांधी जी सहित सभी कांग्रेस नेता बंदी बना लिए गए थे। लेकिन यह आंदोलन मानो जन-आंदोलन था। देश के अधिकांश स्थानों पर सामान्य जन हाथ में तिरंगा लेकर निकल पड़े थे। जनसामान्य की भागीदारी के कारण ही इस आंदोलन को अगस्त क्रांति का नाम मिला।

क्रांतिकारी आंदोलन में चंद्रशेखर आजाद, सरदार भगतसिंह सहित अनगिनत क्रांतिकारियों को फांसी और जेल में डाल देने से भले सशस्त्र क्रांति का धारा में कुछ शिथिलता आई पर काकोरी कांड से पूरी अंग्रेज सरकार हिल गई थी । इसकी गूंज लंदन तक सुनाई दी। तब अंग्रेज सरकार ने दो काम किए। एक तो कुछ नागरिक अधिकार देना आरंभ किया गया और दूसरे अंग्रेज विरोधी क्रांतिकारियों का दमन शुरू हुआ। यह क्रांतिकारी गतिविधियों का दबाव ही था कि अंग्रेजों ने कुछ तटस्थ लोगों को विश्वास में लिया और नागरिक अधिकार देने का क्रम बनाया।

इसके लिए लंदन से कुछ अध्ययन दल आए और आगे चलकर स्थानीय असेंबलियों के चुनाव हुए। काकोरी कांड के नायक चंद्रशेखर आजाद थे। क्रांतिकारियों को धन की आवश्यकता थी। वे अंग्रेजों को भारत से बाहर करने के लिए निर्णायक लड़ाई छेड़ना चाहते थे। इसके लिए धन जुटाने के अनेक प्रयत्न हुए। तभी पता चला कि ट्रेन से सरकारी खजाना जाने वाला है। कहने के लिए यह खजाना सरकारी था, लेकिन अंग्रेज यह पैसा लंदन से लेकर नहीं आए थे। यह भारतीयों का ही पैसा था।

जो अंग्रेजों ने बलपूर्वक वसूला था। क्रान्तिकारियों ने भारत की स्वतंत्रता केलिये सशस्त्र आंदोलन में इस पैसे को लगाने का संकल्प किया और पता लगाया कि यह पैसा कब और किस ट्रेन से ले जाया जाएगा। जिस ट्रेन से यह खजाना जाने वाला था, वह आठ डाउन पैसेंजर थी। इस खजाने को लूटने की योजना बनी। इसमें सत्रह क्रान्तिकारियों की टोली ने हिस्सा लिया। चन्द्र शेखर आजाद के नेतृत्व में बनी इस योजना में रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, योगेशचन्द्र चटर्जी, प्रेमचन्द खन्ना, मुकुन्दीलाल, विष्णु शरण, सुरेश चन्द्र भट्टाचार्य, रामकृष्ण खत्री, मन्मन्थनाथ गुप्त, राजकुमार सिंह ठाकुर, रोशन सिंह, राजेन्द्र लाहिड़ी, गोविन्द शरण, रामदुलारे त्रिवेदी, रामनाथ पांडे, शचीद्धनाथ सान्याल, भूपेश सान्याल और प्रणवेशकुमार शामिल थे।

इसे अंजाम देने के लिए चार जर्मनी-निर्मित माउजर रिवाल्वर जुटाए गए। माउजर की खास बात यह होती है कि यदि इसके बट में लकड़ी का हैंडल लगा दिया जाए तो इसे बंदूक की तरह उपयोग में लिया जा सकता है ।

ट्रेन जैसे ही काकोरी से सहारनपुर के लिये रवाना हुई तो इसे चेन खींचकर रोका गया और ट्रेन पर धावा बोल दिया और खजाना लूट लिया। बाद में अंग्रेजों ने 40 क्रांतिकारियों को बंदी बनाया गया। इनमें चार को फांसी, बारह को उम्रकैद, कालापानी और बाकी को चार-चार साल का कारावास का दंड मिला।

भारत छोड़ो आंदोलन

नौ अगस्त 1945 को भारत छोड़ो आंदोलन आरंभ हुआ। इस आंदोलन के पीछे अंग्रेजों द्वार अपने उस आश्वासन से पीछे हट जाना था, जिसमें अंग्रेजों ने द्वितीय विश्व युद्ध आरंभ होने पर कांग्रेस से सहयोग मांगा और आश्वासन दिया कियुद्ध समाप्ति पर वे भारत को स्वतंत्र कर देंगे। इसकी प्रक्रिया भी अभी से ही शुरू कर देंगे और युद्ध समाप्त होते ही भारत स्वतंत्र हो जाएगा। द्वितीय विश्व युद्ध 1939 में आरंभ हुआ था। इसे आरंभ होने में तीन वर्ष बीत गए थे, पर भारत की स्वतंत्रता के लिए कोई प्रक्रिया आरंभ नहीं हो सकी।

तब 4 जुलाई 1942 में कांग्रेस ने बैठक की और अंग्रेजों से भारत की स्वतंत्रता केलिये प्रक्रिया शुरू करने का स्मरण दिलाया, पर कुछ नतीजा न निकला । नौ अगस्त 1942 को निर्णायक आंदोलन आरंभ करने का निर्णय हुआ। इसके लिए मुंबई का ग्वालिया टैंक पार्क तय हुआ, अब इस पार्क को अगस्त क्रांति मैदान के नाम से जाना जाता है। यद्यपि चार जुलाई 1942 को हुई इस महत्वपूर्ण बैठक में निर्णायक आंदोलन चलाने के निर्णय पर मतभेद थे, कुछ नेता चाहते थे कि द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने तक प्रतीक्षा करनी चाहिए।

इन नेताओं में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी प्रमुख थे। जबकि पंडित जवाहरलाल लाल नेहरू और मौलाना अब्दुल कलाम आजाद ने आंदोलन से पहले अंग्रेजों से बात करने का सुझाव दिया तो सरदार वल्लभभाई पटेल आदि नेता तीन साल बीत जाने पर भी कोई कदम न उठाने पर नाराज थे और तुरन्त आंदोलन छेड़ने के पक्ष में थे। अंतत: अंग्रेजों को एक माह की अवधि दी गई और नौ अगस्त से आंदोलन करने का निर्णय हुआ बैठक में आंदोलन का विरोध कर रहे चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया।

अंग्रेजों ने आंदोलन का नोटिस मिलने के बाद भी भारत की स्वतंत्रता के लिए कोई प्रक्रिया शुरू नहीं की। इसके उलट आंदोलन का दमन करने का निर्णय लिया। आंदोलन की तिथि नौ अगस्त से दो दिन पहले, सात अगस्त से ही देश भर में गिरफ्तारियां शुरू कर दीं। गांधी जी सहित अन्य प्रमुख नेता आठ अगस्त को बंदी बना लिए गए। पर देशव्यापी गिरफ्तारियों के बाद भी आंदोलन न रुका | जन-सामान्य तिरंगा हाथ में लेकर निकल पड़ा।

भारत का संभवत: कोई नगर और कस्बा न बचा जहां लोग हाथ में तिरंगा लेकर घर से न निकले। पुलिस ने पचास से अधिक स्थानों पर गोलियां चलाई, जिनमें सैकड़ों लोग मारे गए। यह आंदोलन महीनों चला। अंततः विवश होकर नवम्बर 1942 में अंग्रेजों ने गांधी जी से चर्चा की और समझौता हुआ। गिरफ्तार लोग रिहा हुए। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में यह आंदोलन अंतिम और निर्णायक था। इस आंदोलन का भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और मुस्लिम लीग ने विरोध किया था। नमन उन हुतात्माओं को जिनके बलिदान से हम स्वतंत्र हवा में सांस ले रहे हैं।

स्रोत: नवयुग का 15 अगस्त 2026 अंक, पृष्ठ 6। यह मूल मुद्रित लेख का डिजिटल पाठ है। मूल ई-पेपर पढ़ें

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