विचार

अपनों से ही लड़ने में व्यस्त दोनों संगठन

नवयुगनवयुग — 15 अगस्त 2026 · 5 मिनट पढ़ें
छपे अंक में पृष्ठ 6 · वर्ष 60 अंक 5

कांग्रेस और भाजपा दोनों संगठन अपनों से ही लड़ने में व्यस्त हैं। कांग्रेस के लिए तो ऐसे घटनाक्रम आम हो गए हैं। लेकिन बीजेपी के लिए यह बिल्कुल नए और अजूबे हैं। हाल के विधानसभा उपचुनाव के बाद दतिया पार्टी के लिए गले की फांस बन गई है। सवाल हार का नहीं है बल्कि बगावत के संक्रमण का है। इतना खुला चैलेंज अब तक नहीं मिला था। दुखी तो बहुत सारे नेता हैं।

दतिया ने कांग्रेस को राज्यसभा चुनाव के झटके से उबरने का मौका दिया है। अगले विधानसभा चुनाव के पहले पार्टी में उत्साह कायम रखने का अवसर दिया है। कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने के अलावा सपना बुनने की भी उम्मीद दी है। कांग्रेस सुधरना चाहती है। पार्टी ने अपने प्रकोष्ठों को भंग कर दिया है। कहा जा रहा है, नए सिरे से गठन होगा।

भंग और निर्माण भीतरघात और गुटबाजी के ही वायरस की बीमारी हैं। कांग्रेस के तो सृजन में भी विसर्जन छिपा है। राज्य में कांग्रेस को जनता ने जितना कमजोर किया है उससे ज्यादा भीतरघात ने डसा है। कांग्रेस के विधायक बगावत कर भाजपा में पहुंचे, तो वायरस वहां भी पहुंच गया। बीजेपी में भीतरघात और बगावत का बड़ा मामला दतिया में ही उजागर हुआ है। नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटना और उसके बाद के सारे घटनाक्रम समीक्षा में हैं। बीजेपी ने दतिया जिला कार्यकारिणी से लेकर जिले के अपने सभी संगठनों को भंग कर दिया है। मुख्यमंत्री और भाजपा अध्यक्ष ने बड़ी बैठक कर हार की समीक्षा भी की है। इसके लिए दो सदस्यों की कमेटी भी बनाई गई है।

नरोत्तम मिश्रा को समीक्षा बैठक नहीं बुलाकर एक तरह से यह संकेत दे ही दिया गया है कि पार्टी का रुख क्या हो सकता है? नरोत्तम मिश्रा जनता में तो पार्टी के लिए पूरी ताकत से काम करते हुए दिखे, लेकिन भीतरघात दिखता नहीं है। इसका तो प्रभाव समझ में आता है। वह हारे हुए प्रत्याशी से भी मुलाकात कर रहे हैं । खबरें ऐसी आ रही हैं कि उनके बारे में राज्य संगठन ने केंद्रीय नेतृत्व को अपनी रिपोर्ट भेज दी है।

बीजेपी में एक तरह का तनाव देखा जा सकता है। कमलनाथ सरकार गिरने के बाद कांग्रेस के बागी विधायकों के सहयोग से बनी बीजेपी सरकार के समय से ही यह तनाव बढ़ता जा रहा है। कई शीर्ष नेताओं के अपने क्षेत्र लगभग खत्म हो गए हैं। अगर सागर जिले का ही उदाहरण लिया जाए तो भाजपा के दो ताकतवर नेता गोपाल भार्गव और भूपेंद्र सिंह नाराज दिखाई पड़ते हैं।

राज्य स्तर पर ही नहीं राष्ट्रीय स्तर पर भी भाजपा में दूसरे दलों से आने वाले नेताओं के कारण मूल कैडर के नेताओं में निराशा का वातावरण दिखता है। दूसरी पार्टियों में टूट-फूट और ऐसे नेताओं के भाजपा में शामिल होने का परसेप्शन भी पार्टी के पक्ष में नहीं दिखाई पड़ रहा है। मध्य प्रदेश और केंद्र में बीजेपी को सत्ता में अच्छा खासा समय हो गया है।

कोई भी राजनीतिक दल लंबे समय तक सत्ता में रहे दूसरे दल की गलतियों पर अपना पक्ष तो मजबूत कर सकता है, लेकिन खुद सत्ता में आने के बाद वैसी ही गलतियां होने पर फिर बचाव का कोई भी रास्ता नहीं बचता।

सियासत में एक बार मौका तो किसी को भी मिल सकता है लेकिन जन विश्वास उसकी योग्यता पर ही लगातार हासिल होता है। राहुल गांधी इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। उनकी विरासत के बावजूद जब से वह राजनीति में आए हैं, कांग्रेस का जनाधार बढ़ने की बजाय घटता ही जा रहा है। अनुशासनहीनता के संकट से हर राजनीतिक दल गुजर रहा है।

कितनी दुर्भाग्यजनक स्थिति है, कि छोटे-मोटे नेता तो छोड़िए पार्टियों के मुख्यमंत्री रह चुके नेता भी दल बदल कर दूसरे दलों में शामिल हो जाते हैं।

अभी तक यह रोग कांग्रेस में ज्यादा रहा है। कांग्रेस के बारह पूर्व मुख्यमंत्री पार्टी छोड़कर दूसरे दल में चले गए। केवल उत्तर में ही नहीं, दक्षिण के राज्यों में भी ऐसी बगावतें हुई हैं।

कई नेता भाजपा से भी बाहर गए हैं, लेकिन दोनों दलों के बीच तुलना होगी तो निश्चित रूप से भाजपा में अनुशासन थोड़ा बेहतर दिखाई पड़ेगा।

मध्य प्रदेश भाजपा का मजबूत संगठन वाला प्रदेश है। बीजेपी जब सत्ता की राजनीति में कहीं भी नहीं थी तब भी यहां मजबूत स्थिति में थी। कैडर बेस्ड पार्टी का नारा भी दरकता दिखाई पड़ता है। दतिया में भीतरघात का संक्रमण पार्टी के लिए खतरे की घंटी है। अगर इसको समझदारीपूर्वक रोका नहीं गया तो फिर धधकने में देर नहीं लगती।

भाजपा के लिए दतिया का अनुभव चुनौतीपूर्ण है। केवल अनुशासन के डंडे से ऐसी चुनौतियों का मुकाबला शायद संभव नहीं होगा। संगठन को भी अपनी निर्णयात्मक गलतियों पर आत्ममंथन करना होगा। भविष्य में जमीनी हकीकत, क्षमता और योग्यता को निर्णय का आधार बनाना पड़ेगा। नए नेतृत्व को आगे लाने की रणनीति को केवल सिद्धांत के तहत नहीं, एक फार्मूले में क्रियान्वित करना होगा। हमेशा पद और सत्ता में रहने की प्रवृत्ति को रोकने पर भी वैचारिक चिंतन और चर्चा करनी पड़ेगी। भाजपा को हर पद के लिए कार्यकाल की समय सीमा तय करने की प्रक्रिया पर भी विचार करना पड़ेगा, साथ ही उसके निर्णय की क्रियान्विति का भी इंतजाम करना होगा।

अब राजनीतिक दलों के लिए बिना किसी आधार के पिक एंड चूज की नीति छोड़नी ही होगी, अन्यथा वे भीतरघात के संक्रमण को रोकने में सफल नहीं होंगे।

स्रोत: नवयुग का 15 अगस्त 2026 अंक, पृष्ठ 6। यह मूल मुद्रित लेख का डिजिटल पाठ है। मूल ई-पेपर पढ़ें

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