15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ, तब देश औपनिवेशिक शोषण, गरीबी, अकाल और चरम पिछड़ेपन से जूझ रहा था। आज 79 वर्षो के क्रमिक विकास के बाद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। कृषि आधारित अर्थतंत्र से निकलकर अंतरिक्ष, सूचना प्रौद्योगिकी और विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में भारत ने अपनी एक अलग पहचान बनाई है।
आज भले ही कुछ भी राग अलापा जाता हो, लेकिन यह ध्रुव सत्य है कि 1947 से लेकर 2026 तक जो भी विकास और प्रगति हुई है वह एक सतत प्रक्रिया है। देश के हर प्रधानमंत्री का योगदान अपने आप में विशिष्ट है। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने कार्यकाल की शुरुआत एक बदहाल देश से की थी, सदियों की गुलामी से मुक्त होते भारत के पास न आधारभूत ढांचा था और न नागरिक सुविधाओं का कुछ अता-पता था। समय अत्यंत आधुनिक और प्रगतिशील सोच के साथ
1947 में भारत
आजादी के समय 1947 में साक्षरता दर मात्र 12%-18% के करीब थी, जो अब (2026) में 77% से 80% तक पहुंच चुकी है। महिला साक्षरता दर तो 10% से भी कम थी। यह एक बड़ी उपलब्धि है। व्यक्ति की जीवन प्रत्याशा लगभग 32 वर्ष थी, जो अब लगभग 70 वर्ष पहुंच रही है। यह बताता है कि देश में जीवन के लिए आवश्यक सुविधाओं और उपभोग में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है। यह कोई 10-15 साल में नहीं हुआ है, बल्कि यह 79 वर्षों की सतत प्रगति और विकास का एक जीता जागता उदाहरण है।
इसी तरह आप देखेंगे स्वतंत्रता के समय केवल 20 विश्वविद्यालय और कुछ सौ कॉलेज थे, आज 1,100 से अधिक विश्वविद्यालय, आईआईटी, आईआईएम, एम्स सहित विशाल शिक्षा तंत्र देश में है। आज हम तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में विश्व में अपना अलग स्थान बना चुके हैं। आधारभूत ढांचे की बात करें तो इस क्षेत्र में हम दुनिया के अविकसित देशों की श्रेणी में आते थे। 1947 की बात करें तो ऊर्जा क्षेत्र में बिजली उत्पादन क्षमता सिर्फ 1,700 मेगावाट थी और नाममात्र का राजमार्गों का तंत्र था। आज हमारी बिजली उत्पादन क्षमता 420 गीगावॉट से अधिक है और 1.4 लाख किलोमीटर का राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क है। यह दुनिया का तीसरा बड़ा सड़क नेटवर्क है।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में हम बदहाल थे। चेचक, हैजा, मलेरिया और पोलिया जैसी महामारियों का प्रकोप था। शिशु मृत्यु दर अत्यधिक उच्च थी और बुनियादी प्राथमिक चिकित्सा केंद्र (PHC) तक पहुंच भी अनुपलब्ध थी । आज भले ही कमी दिखती हो, लेकिन अब हम अधिकांश महामारियों से देश को मुक्त कर चुके हैं। स्वास्थ्य सेवाओं के सरकारी तंत्र के साथ निजी स्वास्थ्य सेवाओं का विशाल नेटवर्क स्थापित हो चुका है, जिनकी विश्वसनीयता भी है। रेलवे नेटवर्क भी सीमित था, आज लगभग 68,000 किलोमीटर का रेल नेटवर्क है। हमारा रेल नेटवर्क अमेरिका, चीन और रूस के बाद विश्व का चौथा सबसे बड़ा नेटवर्क है। यही नहीं एक प्रशासनिक इकाई के अंतर्गत संचालित होने वाला विश्व का दूसरा सबसे बड़ा नेटवर्क होने के साथ विश्व में एक प्रशासन में कर्मचारियों की संख्या के हिसाब से भी विश्व के गिने चुने संस्थानों में है। देश में खाद्य सुरक्षा अनाज के आयात के भरोसे थी, आज खाद्यान्न उत्पादन में न सिर्फ हम आत्मनिर्भर हैं वरन बहुत से देशों को निर्यात भी करते हैं।
इस सम्पूर्ण यात्रा में देश के हर प्रधानमंत्री का बहुमूल्य योगदान है। भारत के पूर्व प्रधानमंत्रियों ने अपने-अपने तरीके से विशिष्ट और ऐतिहासिक योगदान दिया है। भारत निर्माण का यह यज्ञ भारत के पूर्व प्रधानमंत्रियों की प्रगतिशीलता और परिकल्पनाओं का बेहतरीन आइना है। आइए एक दृष्टि कुछ महत्वपूर्ण कार्यों पर डालें-
पंडित जवाहरलाल नेहरू (1947-1964)-आधुनिक भारत के निर्माता के रूप में आईआईटी, आईआईएम, एम्स, भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की नींव रखी। भारी उद्योगों भेल, सेल और बड़े बांधों (भाखड़ा नांगल) का निर्माण कराया।
लाल बहादुर शास्त्री (1964-1966)-जय जवान, जय किसान का नारा दिया और भारत को खाद्य सुरक्षा देने के लिए श्वेत क्रांति (Milk Revolution) और हरित क्रांति के आधार को मजबूत किया।
इंदिरा गांधी (1966-1977, 1980-1984)- 14 प्रमुख बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, 1974 में पोखरण- परमाणु परीक्षण कराया और कृषि आत्मनिर्भरता के लिए हरित क्रांति को पूर्ण रूप से लागू किया। बांग्लादेश की आजादी की सूत्रधार बनीं, जिसकी परिणति पाकिस्तान के विभाजन के रूप में हुई।
राजीव गांधी (1984-1989)- भारत में कंप्यूटर व टेलीकॉम क्रांति की शुरुआत की। पंचायती राज व्यवस्था को सशक्त बनाया और नवोदय विद्यालयों की स्थापना की।
पी. वी. नरसिम्हा राव (1991-1996)- डॉ. मनमोहन सिंह के साथ मिलकर 1991 के आर्थिक उदारीकरण को लागू किया। लाइसेंस राज खत्म कर भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक बाजार के लिए खोल दिया।
अटल बिहारी वाजपेयी (1998-2004)- स्वर्णिम चतुर्भुज योजना और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना से बुनियादी ढांचे में क्रांति लाए। सर्व शिक्षा अभियान की शुरुआत की और 1998 में पोखरण-II परमाणु परीक्षण कर भारत को परमाणु शक्ति बनाया।
डॉ मनमोहन सिंह (2004-2014)- मनरेगा , शिक्षा का अधिकार कानून, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन और भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौता किया। देश की जीडीपी वृद्धि दर ऐतिहासिक स्तर पर पहुंची।
नरेन्द्र मोदी (2014-वर्तमान)- डिजिटल इंडिया, स्वच्छ भारत अभियान, आयुष्मान भारत (विश्व की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना), राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और यूपीआई आधारित डिजिटल क्रांति। साथ ही वंदे भारत एक्सप्रेस, नए एक्सप्रेसवे और पीएम गतिशक्ति जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को गति दी।
इस तरह देखेंगे कि हर प्रधानमंत्री का अपना विशिष्ट और महत्वपूर्ण स्थान भारत की प्रगति के इतिहास में है। राजनीतिक चश्मे से देखने पर सबमें कुछ कमियों को इंगित करना दूषित मानसिकता होगी, यदि हम इन्हें समग्र और निष्पक्ष दृष्टि से नहीं देखेंगे तो यह हमारा देश के इतिहास को नकारने का प्रयास मात्र होगा।
चुनौतियां अभी भी हैं!
स्वतंत्रता के पश्चात हुईअभूतपूर्व प्रगति के बावजूद आज तीन प्रमुख क्षेत्रों में गंभीर ढांचागत चुनौतियां बनी हुई हैं-
1. आधारभूत ढांचा (इंफ्रास्ट्रक्चर): शहरी-ग्रामीण विषमता एक बड़ी चिंता का विषय है। मेट्रो शहरों का विकास तेजी से हुआ है, परंतु ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी बारहमासी सड़कों, लॉजिस्टिक्स कनेक्टिविटी और आधुनिक जल निकासी प्रणालियों का अभाव है। लॉजिस्टिक्स लागत-भारत में लॉजिस्टिक्स लागत जीडीपी का लगभग 13-14% है, जबकि विकसित देशों में यह 8-9% है।
जलवायु परिवर्तन- बढ़ते प्रदूषण और अनियोजित शहरीकरण के कारण इंफ्रास्ट्रक्चर पर दबाव बढ़ रहा है।
2. स्वास्थ्य
किसी भी देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को खड़ा करने बजट आवंटन एक महत्वपूर्ण घटक है, लेकिन हमारे देश बड़ी समस्या बजट का कम आवंटन है। भारत सरकार जीडीपी का केवल 2.1% के आसपास स्वास्थ्य पर खर्च करती है, जो वैश्विक औसत से काफी कम है।
आउट ऑफ पॉकेट एक्सपेंस- आज भी आम नागरिक का एक बड़ा हिस्सा बीमारियों के इलाज में अपनी जेब से खर्च होता है, जिससे कई परिवार गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं।
डॉक्टर-मरीजों का अनुपात- ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों, नसों और आधुनिक चिकित्सा उपकरणों की भारी कमी है।
3.शिक्षा: गुणवत्ता और कौशल विकास- स्कूलों की संख्या जरूर बढ़ी है, लेकिन बुनियादी पठन-पाठन की क्षमता और स्किल-गैप गंभीर मुद्दा है।
रोजगारपरकता की कमी- हर साल लाखों छात्र स्नातक होते हैं, लेकिन उद्योग की मांग के अनुसार व्यावहारिक कौशल न होने के कारण बेरोजगारी का सामना करते हैं।
डिजिटल डिवाइड- ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए डिजिटल शिक्षा और आधुनिक तकनीक तक पहुंच सीमित है।
फिर भी असाधारण
1947 के अभावों भरे दौर से निकलकर 2026 तक भारत ने जो सफर तय किया है, वह असाधारण है। आज भारत न केवल एक क्षेत्रीय शक्ति है, बल्कि वैश्विक मंच पर एक निर्णायक अर्थव्यवस्था है। यदि भारत अपनी शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करे, स्वास्थ्य सेवा पर सार्वजनिक व्यय बढ़ाए और समावेशी इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण करे, तो विकसित भारत का सपना निश्चित ही साकार हो सकता है।
स्रोत: नवयुग का 15 अगस्त 2026 अंक, पृष्ठ 1,2। यह मूल मुद्रित लेख का डिजिटल पाठ है। मूल ई-पेपर पढ़ें