भारतीय राजनीति के इतिहास में युवा हमेशा से बदलाव का संवाहक रहा है, लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जेन-जी यानी नई पीढ़ी के युवा मतदाताओं की ताकत ने देश की पूरी राजनैतिक व्यवस्था का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। सत्ता के सिंहासन पर आसीन होने या उसमें बने रहने की इच्छा रखने वाला हर राजनीतिक दल अब युवा शक्ति के सामने नतमस्तक नजर आ रहा है। 8 अगस्त 2026 का दिन भारतीय राजनीति में इस बात का स्पष्ट साक्षी बना।
NEET परीक्षा धांधली और छात्र असंतोष के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद यह साफ हो गया है कि जेन-जी ने अपने राजनीतिक व सामाजिक प्रभाव का लोहा मनवा लिया है।
युवा जनमत और आंदोलन की नई लहर:
जब-जब देश में बड़े राजनीतिक परिवर्तन हुए हैं, उनमें युवा वर्ग का निर्णायक योगदान रहा है। 2014 के बाद से निर्मित मोदी युग की सफलता में भी युवा मतदाताओं की अहम भूमिका रही है, लेकिन आज का युवा केवल मूक दर्शक नहीं है।
हाल ही में कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले जंतर-मंतर पर हुए व्यापक प्रदर्शनों ने देशव्यापी अलख जगाई है। दिल्ली, झारखंड और बिहार के शैक्षणिक व प्रशासनिक गलियारों से आ रही छात्र आक्रोश की तस्वीरें सत्ता पक्ष और विपक्ष-दोनों के रणनीतिकारों की धड़कनें बढ़ा रही हैं। यह स्पष्ट हो चुका है कि कोई भी दल युवाओं के समर्थन और विश्वास के बिना सत्ता का सुख नहीं भोग सकता। यही कारण है कि आज सत्ता और विपक्ष दोनों जेन-जी शरणम् गच्छामी की मुद्रा में खड़े दिख रहे हैं।
प्रधानमंत्री का रुख:
राष्ट्रनिर्माण और विकसित भारत का आधार का सपना प्रधानमंत्री मोदी के भाषणों का आधार बनता दिखाई दे रहा है। सीजेपी के राष्ट्रव्यापी छात्र प्रदर्शनों के बाद आठ अगस्त 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आईआईटी, दिल्ली के 57वें दीक्षांत समारोह में छात्रों से सीधा संवाद किया। हकीकत में जेन-जी शरणम् गच्छामी के साथ उनका पहला बड़ा सार्वजनिक संवाद था। युवाओं की बातें सहानुभूति से सुनना और संवाद कायम करने का उनका यह पहला प्रयास था। अपने चिर-परिचित मजाकिया अंदाज में बाबा बागेश्वर का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भले ही वे कोई चमत्कारी बाबा न हों, लेकिन वे अच्छी तरह समझते हैं कि युवाओं के मन में अपने भविष्य को लेकर क्या हलचल चल रही है।
उनके संवाद में भविष्य के रोडमैप की भी झलक दिखाई दी। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कहा, हमें आप पर अटूट भरोसा है और देश को आपकी प्रतिभा की जरूरत है।
आगे अपनी बात कहते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि आगामी 30 से 35 वर्ष भारत के “विकसित भारत' बनने के सपने को तय करेंगे। इसलिए युवाओं के हर व्यक्तिगत और व्यावसायिक फैसले का आधार यह होना चाहिए कि उससे देश को क्या लाभ हो रहा है। नरेंद्र मोदी का अंतर्निहित संदेश यह था कि युवा विपक्ष की नकारात्मक राजनीति के बहकावे में आने के बजाय राष्ट्रहित में तार्किक निर्णय लें। इस बात से युवाओं में निराशा भी दिखी कि तत्काल मरहम या राहत के लिए उनके प्रधानमंत्री खाली हाथ पहुंचे थे और 30-35 साल जैसे नुस्खे वे देते ही रहे हैं।
विपक्ष अर्थात राहुल गांधी का प्रहार
यह संयोग था या प्रयोग ठीक उसी दिन (8 अगस्त 2026) उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में आयोजित “छात्रों की गूंज' कार्यक्रम में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सीधे प्रतियोगी परीक्षाओं, बेरोजगारी और अर्थव्यवस्था के मुद्दों पर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। रोजगार संकट और संस्थागत एकाधिकार का मुद्दा उनके एजेंडे में था। रोजगार के घटते अवसरों पर बोलते हुए राहुल गांधी ने दावा किया कि आज स्थिति यह है कि 1,000 में से महज 12 युवाओं को ही रोजगार मिल पा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि युवाओं की निजी जानकारी और डेटा बेचा जा रहा है।
रील्स का नशा और आज की वास्तविकता पर भी अपना ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने युवाओं को आगाह करते हुए कहा कि शॉर्ट रील्स और वीडियो 21वीं सदी का नया नशा हैं। केवल रील्स बनाने में समय गंवाने से नौकरियां नहीं मिलेंगी।
आर्थिक विषमता और संघ समर्थित संस्थाओं और व्यक्तियों पर संस्थागत नियंत्रण पर भी युवाओं का ध्यान खींचा। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले 10 वर्षों में चुनिंदा कॉर्पोरेट घरानों की आमदनी 30 गुना बढ़ी है, जबकि आम युवाओं के लिए रोजगार के रास्ते बंद हुए हैं। साथ ही, उन्होंने कहा कि देश की न्यायपालिका, नौकरशाही, मीडिया और विश्वविद्यालयों में एक विशेष विचारधारा के प्रचारकों का वर्चस्व स्थापित किया जा रहा है।
अहिंसक बदलाव की अपील कर अपनी छवि को चमकाने का काम भी उन्होंने किया। हालिया छात्र आंदोलनों की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि युवाओं ने अंधेरे में रोशनी जलाई है, और बदलाव का यह मार्ग हिंसा नहीं बल्कि प्यार और लोकतांत्रिक तरीके से तय होगा।
संघ का संकेत
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जंतर-मंतर पर सीजेपी के प्रदर्शन के बाद युवाओं को तार्किक व भावनात्मक रूप से अपने पाले में लाने की होड़ तेज हो गई है। सत्ता और विपक्ष दोनों की निगाहें अब 2029 के आम चुनाव पर टिकी हैं।
दिलचस्प बात यह है कि केवल राजनीतिक दल ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ( आरएसएस) ने भी जेन-जी की मानसिकता को भांप लिया है। संघ की ओर से भी यह स्वीकार किया गया है कि आज की जेन-जी पीढ़ी अधिक पारदर्शी, ईमानदार और राष्ट्रभक्त है। यह संकेत पर्याप्त है कि इस नई पीढ़ी की आकांक्षाओं, डिजिटल सोच और रोजगार की जरूरतों को नजरअंदाज करके देश का कोई भी संगठन या दल अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित नहीं कर सकता।
लब्बेलुआब यह…
इस सबका लब्बेलुआब यह है कि सत्ता हासिल करना या उसे बनाए रखना ही राजनीति का मुख्य लक्ष्य है, और इस लक्ष्य की कुंजी जेन-जी के हाथों में है। 8 अगस्त 2026 की घटनाओं ने यह सिद्ध कर दिया है कि भारत का युवा अब केवल वोटों का आंकड़ा नहीं, बल्कि नीतियों और राजनीतिक फैसलों को बदलने वाली एक सशक्त आवाज है। लेकिन अभी रुकिए, किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना राजनीतिक रूप से जोखिमभरा है। जेन-जी अभी अपने पंख पसारने की जद्दोजहद में है। सीजेपी के मुखिया अभिजीत दिपके बेहद सावधानी से कदम उठा रहे हैं। पेशेवर राजनीतिज्ञ अभी तक उन्हें और उनकी क्षमताओं को परख नहीं पा रहे हैं। याद रखिए सीजेपी ने अगर ग्रामीण क्षेत्रों की ओर ठोस कदम बढ़ा दिए, तो देश का पूरा राजनीतिक परिदृश्य चुनावी राजनीति के आईने में कुछ अलग और नया ही होगा। पेशेवर राजनेताओं की फौज उनके कदमों को परखने में अभी तक असफल रही है, इसलिए आगे की राजनीति दिलचस्प होना तय है।
स्रोत: नवयुग का 15 अगस्त 2026 अंक, पृष्ठ 7। यह मूल मुद्रित लेख का डिजिटल पाठ है। मूल ई-पेपर पढ़ें

